रविवार, 16 सितंबर 2012
सन 2000 के बाद किसी तेल कम्पनी को घाटा नही हुआ देखे बेलेंस शीट ...........
देश में डीजल व पेट्रोलियम पदार्थो के दाम जब भी बढ़ाए जाते हैं, तो इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल के दाम बढ़ने का हवाला दिया जाता हें या फिर तेल कंपनियों के घाटे की दुहाई दी जाती है।
लेकिन पिछले 6 सालो में कच्चे तेल के दाम 88 डॉलर से 125 डॉलर के आसपास रहे हें, जब इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल के दाम 96 डॉलर प्रति बेरल थे, तो पेट्रोल 42 रूपये लीटर था, उसके बाद से मार्केट में पेट्रोल के दाम 12 बार बढाये हें| और बार घटे का रोना तेल कंपनियों ने रोया हें | बाहरी देश ये सोच कर ही हेरान होते हे की लाखो करोड़ के इतने घोटाले होने के बाद भी भारत की अर्थ वयवस्था केसे खड़ी हे | इसके पीछे सरकार द्वारा वसूला जाने वाला लाखो करोड़ो के टेक्स हें |
सूचना के अधिकार (आरटीआइ) के तहत पता चला है कि पेट्रोलियम कंपनियां हर साल भारी मुनाफा कमा रही हैं। वर्ष 2010-11 में ही उन्होंने 25 हजार करोड़ रुपये से भी अधिक का शुद्ध मुनाफा कमाया। यह जानकारी विकास गहलोत ने आरटीआइ के सहारे हासिल की है। विकास ने हिंदुस्तान पेट्रोलियम, भारत पेट्रोलियम, इंडियन ऑयल, ओएनजीसी, गेल इंडिया, नुमालीगढ़ रिफाइनरी, बामर लॉरी एंड कंपनी से उनकी लाभांश रिपोर्ट मांगी। इस पर कंपनियों ने जो जवाब दिए वो दिमाग की बत्ती गुल करने के साथ ही, चौंकाने वाले भी हैं। इससे पता चला है कि किसी भी तेल कंपनी को साल 2000 के बाद कोई नुकसान ही नहीं हुआ है। फिर भी पेट्रोल, डीजल या गैस की कीमत बढ़ा दी जाती है। यदि प्रमुख कंपनियों के साल 2010-11 के शुद्ध मुनाफे को जोड़ दिया जाए, तो यह करीब 25 हजार करोड़ रुपये के आंकड़े को छू जाता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि तेल के दाम बढ़ाने के पीछे सिर्फ मुनाफा बढ़ाना ही कंपनियों का मुख्य कार्य है।
कंपनी वित्त वर्ष मुनाफा
1. आइओसीएल 2006-07 7499 करोड़
2007-08 6963 करोड़
2008-09 2950 करोड़
2009-10 10,221 करोड़
2010-11 7445 करोड़
2. बीपीसीएल 2006-07 1805 करोड़
2007-08 1580 करोड़
2008-09 735 करोड़
2009-10 1537 करोड़
2010-11 1546 करोड़
3. एचपीसीएल 2009-10 8715 करोड़
2010-11 9373 करोड़
4. ओएनजीसी 2006-07 901 करोड़
2007-08 1663 करोड़
2008-09 2806 करोड़
2009-10 2089 करोड़
2010-11 2690 करोड़
5. गेल (इंडिया) 2006-07 2386 करोड़
2007-08 2601 करोड़
2008-09 2803 करोड़
2009-10 3139 करोड़
2010-11 3561 करोड़
(सारा शुद्ध लाभ करोड़ रुपये में )
लेकिन पिछले 6 सालो में कच्चे तेल के दाम 88 डॉलर से 125 डॉलर के आसपास रहे हें, जब इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल के दाम 96 डॉलर प्रति बेरल थे, तो पेट्रोल 42 रूपये लीटर था, उसके बाद से मार्केट में पेट्रोल के दाम 12 बार बढाये हें| और बार घटे का रोना तेल कंपनियों ने रोया हें | बाहरी देश ये सोच कर ही हेरान होते हे की लाखो करोड़ के इतने घोटाले होने के बाद भी भारत की अर्थ वयवस्था केसे खड़ी हे | इसके पीछे सरकार द्वारा वसूला जाने वाला लाखो करोड़ो के टेक्स हें |
सूचना के अधिकार (आरटीआइ) के तहत पता चला है कि पेट्रोलियम कंपनियां हर साल भारी मुनाफा कमा रही हैं। वर्ष 2010-11 में ही उन्होंने 25 हजार करोड़ रुपये से भी अधिक का शुद्ध मुनाफा कमाया। यह जानकारी विकास गहलोत ने आरटीआइ के सहारे हासिल की है। विकास ने हिंदुस्तान पेट्रोलियम, भारत पेट्रोलियम, इंडियन ऑयल, ओएनजीसी, गेल इंडिया, नुमालीगढ़ रिफाइनरी, बामर लॉरी एंड कंपनी से उनकी लाभांश रिपोर्ट मांगी। इस पर कंपनियों ने जो जवाब दिए वो दिमाग की बत्ती गुल करने के साथ ही, चौंकाने वाले भी हैं। इससे पता चला है कि किसी भी तेल कंपनी को साल 2000 के बाद कोई नुकसान ही नहीं हुआ है। फिर भी पेट्रोल, डीजल या गैस की कीमत बढ़ा दी जाती है। यदि प्रमुख कंपनियों के साल 2010-11 के शुद्ध मुनाफे को जोड़ दिया जाए, तो यह करीब 25 हजार करोड़ रुपये के आंकड़े को छू जाता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि तेल के दाम बढ़ाने के पीछे सिर्फ मुनाफा बढ़ाना ही कंपनियों का मुख्य कार्य है।
कंपनी वित्त वर्ष मुनाफा
1. आइओसीएल 2006-07 7499 करोड़
2007-08 6963 करोड़
2008-09 2950 करोड़
2009-10 10,221 करोड़
2010-11 7445 करोड़
2. बीपीसीएल 2006-07 1805 करोड़
2007-08 1580 करोड़
2008-09 735 करोड़
2009-10 1537 करोड़
2010-11 1546 करोड़
3. एचपीसीएल 2009-10 8715 करोड़
2010-11 9373 करोड़
4. ओएनजीसी 2006-07 901 करोड़
2007-08 1663 करोड़
2008-09 2806 करोड़
2009-10 2089 करोड़
2010-11 2690 करोड़
5. गेल (इंडिया) 2006-07 2386 करोड़
2007-08 2601 करोड़
2008-09 2803 करोड़
2009-10 3139 करोड़
2010-11 3561 करोड़
(सारा शुद्ध लाभ करोड़ रुपये में )
ईस्ट इंडिया कम्पनी वापस आ रही हे भारत (देश पर सेकड़ो साल राज करने और लुटने वाली) नया नाम वाल-मार्ट....
लगता है ये सरदार अपनी ''ख़ामोशी का मियां मिट्टू'' को यह गलत फहमी हो गई है की वर्तमान में दुनियां में एक ही अर्थ शास्त्री जिन्दा बचा है ( खुद वो ) जो पुरे हिंदुस्तान को बेवकूफ बना सकता है ।
सरदार जी समझा रहें हैं की ...............
एफ डी आई की वजह से ''वितीय घाटा कम होगा "
सरदार जी समझा रहें हैं की ...............
एफ डी आई की वजह से ''वितीय घाटा कम होगा "
सरदार जी समझते हे की देश की जनता तो बेवकूफ है, जो इतना नहीं समझती कि -
जो विदेशी कम्पनी खुदरा बाज़ार( किराना ) में आयेंगी, वो हमारे खुदरा बाज़ार में सेंध लगाएंगी।
मतलब कुल बाजार का बड़ा हिस्सा उनके ( विदेशी वाल मार्ट ) हाथ और छोटा हिस्सा गुलाम हिन्दुस्तानी के हाथ, पर बाज़ार उतने का उतना ही रहेगा, इसका मतलब वित्तीय व्यपार तो उतना ही रहना है।
क्यों की विदेशी कम्पनी से आटा खरीदने से आप चार की जगह दस रोटी तो नहीं खाओगे।
बल्कि जो वो कमाएंगे उसमे से 30 % वे अपना पैसा देश के बाहर भेजेंगे।
जिसकी वजह से एक मुर्ख अर्थ शास्त्री भी बता देगा की हमारी वित्तीय घटा बढेगा |
सोचो जनता तुम्हें कितना......................" मुर्ख , गधा गवांर और गुलाम समझते हैं ये काले अंग्रेज "
मतलब कुल बाजार का बड़ा हिस्सा उनके ( विदेशी वाल मार्ट ) हाथ और छोटा हिस्सा गुलाम हिन्दुस्तानी के हाथ, पर बाज़ार उतने का उतना ही रहेगा, इसका मतलब वित्तीय व्यपार तो उतना ही रहना है।
क्यों की विदेशी कम्पनी से आटा खरीदने से आप चार की जगह दस रोटी तो नहीं खाओगे।
बल्कि जो वो कमाएंगे उसमे से 30 % वे अपना पैसा देश के बाहर भेजेंगे।
जिसकी वजह से एक मुर्ख अर्थ शास्त्री भी बता देगा की हमारी वित्तीय घटा बढेगा |
सोचो जनता तुम्हें कितना......................" मुर्ख , गधा गवांर और गुलाम समझते हैं ये काले अंग्रेज "
शनिवार, 15 सितंबर 2012
देश में शोक की लहर, आरएसएस के पूर्व सर संघचालक के सुदर्शन का निधन.....
आरएसएस के प्रवक्ता राम राघव ने बताया कि वह शनिवार सुबह जब मॉर्निंग वॉक से लौट कर आए थे, तभी वह कुछ थकावट और बैचेनी महसूस कर रहे थे। कुछ देर बाद उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए, और देवलोक गमन कर गये | राघव ने बताया कि उनकी पार्थिव देह को अंतिम संस्कार से पूर्व जनता के दर्शनों के लिए रखा जाएगा।
के. सुदर्शन का पूरा नाम था, कुप्पाली सीतारमैया सुदर्शन, इनका जन्म 18 जून 1931 को छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले में एक ब्राहमण परिवार में हुआ था। 1954 में वह आरएसएस से प्रचारक के तौर पर जुड़े थे। सुदर्शन 10 मार्च 2000 को आरएसएस के सर संचालक पद के लिए चुने गए थे। वह राजेंद्र सिंह की जगह इस पद के लिए चुने गए थे, उन्हें अपनी खराब सेहत के चलते इस पद से हटना पड़ा था। उनके निधन पर बीजेपी ने गहरा शोक व्यक्त किया है। और पुरे देश में आरएसएस के लोगो में शोक की लहर फेल गयी हें | अभी तक देश के किसी नेता ने शोक वयक्त नही किया हें, क्यों की उन्हें घोटालो से ही फुर्सत नही हें|
देश में शिव जी के 12 ज्योतिर्लिंग थे,11 तो हें 12 वाँ कहाँ गया ? जाने पूरी हकीकत.........
>प्रो. ओक कि खोज ताजमहल के नाम से प्रारम्भ होती है———
=”महल” शब्द, अफगानिस्तान से लेकर अल्जीरिया तक किसी भी मुस्लिम देश में भवनों के लिए प्रयोग नही किया जाता…
यहाँ यह व्याख्या करना कि, महल शब्द मुमताज महल से लिया गया है……वह कम से कम दो प्रकार से तर्कहीन है-
पहला - शाहजहाँ कि पत्नी का नाम मुमताज महल कभी नही था, बल्कि उसका नाम मुमताज-उल-ज़मानी था ।
और दूसरा - किसी भवन का नामकरण किसी महिला के नाम के आधार पर रखने के लिए केवल अन्तिम आधे भाग (ताज)का ही प्रयोग किया जाए और प्रथम अर्ध भाग (मुम) को छोड़ दिया जाए, यह समझ से परे है ।
प्रो.ओक दावा करते हैं कि,ताजमहल नाम तेजो महालय (भगवान शिव का महल) का बिगड़ा हुआ संस्करण है, साथ ही साथ ओक कहते हैं कि -
मुमताज और शाहजहाँ कि प्रेम कहानी, चापलूस इतिहासकारों की भयंकर भूल और लापरवाह पुरातत्वविदों की सफ़ाई से, स्वयं गढ़ी गई कोरी अफवाह मात्र है, क्योंकि अगर इसमे थोड़ी भी सच्चाई होती तो शाहजहाँ के समय का कम से कम एक शासकीय अभिलेख इस प्रेम कहानी की पुष्टि कही ना कही जरुर करता है…..
इसके अतिरिक्त बहुत से प्रमाण ओक के कथन का प्रत्यक्षतः समर्थन कर रहे हैं……
तेजो महालय (ताजमहल) मुग़ल बादशाह के युग से पहले बना था, और यह भगवान् शिव को समर्पित था तथा आगरा के राजपूतों द्वारा पूजा जाता था ।
==>न्यूयार्क के पुरातत्वविद प्रो. मर्विन मिलर ने ताज के यमुना की तरफ़ के दरवाजे की लकड़ी की कार्बन डेटिंग के आधार पर 1985 में यह सिद्ध किया कि, यह दरवाजा सन् 1359 के आसपास अर्थात् शाहजहाँ के काल से लगभग 300 वर्ष पुराना है ।
==>मुमताज कि मृत्यु जिस वर्ष (1631) में हुई थी, उसी वर्ष के अंग्रेज भ्रमण कर्ता पीटर मुंडी का लेख भी इसका समर्थन करता है कि, ताजमहल मुग़ल बादशाह के पहले का एक अति महत्वपूर्ण भवन था ।
==>यूरोपियन यात्री जॉन अल्बर्ट मैनडेल्स्लो ने सन् 1638 (मुमताज कि मृत्यु के 07 साल बाद) में आगरा भ्रमण किया, और इस शहर के सम्पूर्ण जीवन वृत्तांत का वर्णन किया, परन्तु उसने ताज के बनने का कोई भी सन्दर्भ नही प्रस्तुत किया, जबकि भ्रांतियों मे यह कहा जाता है कि ताज का निर्माण कार्य 1631 से 1651 तक जोर शोर से चल रहा था ।
==>फ्रांसीसी यात्री फविक्स बर्निअर एम.डी. जो औरंगजेब द्वारा गद्दीनशीन होने के समय भारत आया था, और लगभग दस साल यहाँ रहा, के लिखित विवरण से पता चलता है कि, औरंगजेब के शासन के समय यह झूठ फैलाया जाना शुरू किया गया कि, ताजमहल शाहजहाँ ने बनवाया था…….
प्रो. ओक. बहुत सी आकृतियों और शिल्प सम्बन्धी असंगताओं को इंगित करते हैं जो इस विश्वास का समर्थन करते हैं कि, ताजमहल विशाल मकबरा न होकर विशेषतः हिंदू शिव मन्दिर है…….
आज भी ताजमहल के बहुत से कमरे शाहजहाँ के काल से बंद पड़े हैं, जो आम जनता की पहुँच से परे हैं। प्रो. ओक जोर देकर कहते हैं कि, हिंदू मंदिरों में ही पूजा एवं धार्मिक संस्कारों के लिए भगवान् शिव की मूर्ति, त्रिशूल,कलश और ॐ आदि वस्तुएं प्रयोग की जाती हैं।
==>ताज महल के सम्बन्ध में यह आम किवदंत्ती प्रचलित है कि ताजमहल के अन्दर मुमताज की कब्र पर सदैव बूँद बूँद कर पानी टपकता रहता है, यदि यह सत्य है तो पूरे विश्व मे किसी कि भी कब्र पर बूँद बूँद कर पानी नही टपकाया जाता, जबकि प्रत्येक हिंदू शिव मन्दिर में ही शिवलिंग पर बूँद बूँद कर पानी टपकाने की व्यवस्था की जाती है, फ़िर ताजमहल (मकबरे) में बूँद बूँद कर पानी टपकाने का क्या मतलब….????
राजनीतिक भर्त्सना के डर से इंदिरा गाँधी सरकार ने ओक की सभी पुस्तकें स्टोर्स से वापस ले लीं थीं, और इन पुस्तकों के प्रथम संस्करण को छापने वाले संपादकों को भयंकर परिणाम भुगत लेने की धमकियां भी दी गईं थी ।
प्रो. पी. एन. ओक के अनुसंधान को ग़लत या सिद्ध करने का केवल एक ही रास्ता है, कि वर्तमान केन्द्र सरकार बंद कमरों को संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षण में खुलवाए, और अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों को छानबीन करने दे ।
ज़रा सोचिये….!!!!!!
कि यदि ओक का अनुसंधान पूर्णतयः सत्य है तो किसी देशी राजा के बनवाए गए संगमरमरी आकर्षण वाले खूबसूरत, शानदार एवं विश्व के महान आश्चर्यों में से एक भवन, “तेजो महालय” को बनवाने का श्रेय बाहर से आए मुग़ल बादशाह शाहजहाँ को क्यों……?????
तथा -
इससे जुड़ी तमाम यादों का सम्बन्ध मुमताज-उल-ज़मानी से क्यों……..??????? ताजमहल के बारे में ये लाइने बिलकुल सटीक बैठती हें--
आंसू टपक रहे हैं, हवेली के बाम से,
रूहें लिपट के रोती हैं, हर खासों आम से,
अपनों ने बुना था हमें, कुदरत के काम से,
फ़िर भी यहाँ जिंदा हैं, हम गैरों के नाम से,
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