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गुरुवार, 20 सितंबर 2012

केसे कहें की हम आजाद हें, आज भी अंग्रेजी कानून की पालना में जुटी भारतीय पुलिस........

लाला लाजपात राय अंग्रेजो के खिलाफ़ लड़ रहे थे । अंग्रेजी पुलिस ने उनके सिर में लाठिया मार मार के उनको मार दिया । आजादी के 64 साल बाद 4 जून 2012 को भ्रष्ट कांग्रेस की केंद्र सरकार के खिलाफ़ आन्दोलन कर रहे लोगो में शामिल बहन राजबाला को पुलिस ने डंडे मार मार उनकी हत्या कर दी। आजादी के 64 साल बाद आज भी पुलिस आन्दोलन करने वाले भारतवासियो को वैसे ही डंडे मारती हें, जैसे अंग्रेजो की पुलिस मारती तो थी, तो कैसे कहें की हम आजाद हैं ?
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आखिर ये पुलिस बनी कब ?????????
10 मई 1857 को जब देश में क्रांति हो गई । और भारतवासियों ने पूरे देश में 3 लाख अंग्रेजो को मार डाला । उस समय क्रांतिकारी थे मंगल पांडे, तांतिया टोपे, नाना साहब पेशवा आदि । लेकिन कुछ गद्दार राजाओ के वजह से अंग्रेज दुबारा भारत में घुस आयें । और दुबारा अंग्रेजो को भगाने के लिये 1857 से लेकर 1947 तक पुरे 90 साल लग गये । और इसके लिये भगत सिहं,उधम सिहं , चंद्र शेखर आजाद ,राम प्रसाद बिसमिल, सुभाष चन्द्र बोस जैसे 7 लाख 32 हजार क्रान्तिवीरो को अपनी जान देनी पड़ी । जब अंग्रेज दुबारा भारत में आये, तब उन्होने फ़ैसला किया कि अब हम भारतवासियों को सीधे मारेंगे पीटेंगे नहीं । अब हम इनको कानून बना कर मारेंगे और गुलाम रखेंगे । उनको डर था कि 1857 जैसी क्रान्ति दुबारा न हो जाये । तब अंग्रेजो ने इंडियन POLICE ACT बनाया । नाम मे indian लिखा है !लेकिन indian कुछ नहीं इसमे !! और पुलिस बनायी । उसमे एक धारा बनाई गई right to offence | इसका मतलब था, और हें की पुलिस वाला आप पर जितनी मर्जी लाठिया मारे, पर आप कुछ नहीं कर सकते और अगर आपने लाठी पकड़ने की कोशिश की, तो आप पर मुकद्दमा चलेगा । इसी कानून के आधार पर सरकार आन्दोलन करने वालो पर लाठिया बरसाया करती थी । फ़िर ऐसी ही एक धारा 144 बनाई गई, ताकि लोग सरकार की गलत नीतियों का विरोध करने के लिए इकट्ठे ना हो सके । ऐसे ही कुछ और खतरनाक कानुन बनाने के लिये साईमन कमीशन भारत आने वाला था । क्रान्तिकारी लाला लाजपत राय जी ने उसका शान्तिपूर्ण तरीके से विद्रोह कर रहे थे । अंग्रेजी पुलिस के एक अफ़सर सांडर्स ने उन के सर पर लाठिया बरसानी शुरु कर दी । एक लाठी मारी ,दो मारी ,तीन ,चार ,पांच करते करते 14 लाठिया मारी । नतीजा ये हुआ लाला जी के सर से खून ही खून बहने लगा, उनको अस्तपताल लेकर गये, ज्यादा खून बहने से वहां उनकी मौत हो गई । लोगो ने कहा हत्यारे सांडर्स को सज़ा मिलनी चाहिए | इसके लिये शहीदेआजम भगत सिंह ने अदालत में सांडर्स मुकद्दमा कर दिया । सुनवाई हुई । अंग्रेजी अदालत ने फैसला दिया कि लाला पर जी जो लाठिया मारी गई है, वो कानून के आधार पर मारी गई है, अब इसमे उनकी मौत हो गई तो अंग्रेज सरकार की कोई गलती नही हें | उनके अनुसार हम क्या करे इसमे कुछ भी गलत नहीं है ।नतीजा सांडर्स  को बाइज्जत बरी कर दिया गया । तब भगत सिंह को गुस्सा आया, उसने कहा जिस अंग्रेजी न्याय व्यवस्था ने लाला जी के हत्यारे को बाईज्जत बरी कर दिया । उसको सज़ा मैं दुंगा । और इसे वहीं पहुँचाउगा, जहाँ इसने लाला जी पहुँचाया है । और जैसा आप जानते फ़िर भगत सिंह ने सांड्र्स को गोली से उड़ा दिया । और फ़िर भगत सिंह को इसके लिये फ़ांसी की सज़ा हुई ।
जिंदगी के अंतिम दिनो जब भगत सिंह लाहौर जेल में बंद थे, तो बहुत से पत्रकार उनसे मिलने जाया करते थे । और भगत सिंह से पुछा उनकी कोई आखिरी
इच्छा और देश के युवाओ के लिये कोई संदेश ? तब शहीदे आजम भगत सिंह ने कहा कि मैं देश के नौजवानो से उम्मीद करता हूँ ।
कि जिस indian police act के कारण लाला जी जान गई । जिस indian police एक्ट के आधार मैं फ़ांसी चढ़ रहा हूँ । मै आशा करता हुं, इस देश के नौजवान आजादी मिलने से पहले पहले इस indian police act खत्म करवां देगें ।ये मेरी भावना है | यही मेरे दिल की इच्छा है । लेकिन ये बहुत शर्म की बात है अजादी मिलने के बाद जिन लोगो ने देश कि सत्ता संभाली । उन्होने अंग्रेजो का भारत को बरबाद करने के लिये बनाये गये कानुनो में से एक भी कानुन नही बदला । बहुत शर्म की बात है, आजादी के ६४ साल बाद आज भी इस कानून को हम खत्म नहीं करवा पाये । आज भी आप देखो indian police act के आधार पर पुलिस देश वासियो पर कितना जुल्म करती है । कभी अंदोलन करने वाले किसनो को डंडे मारती है । कभी औरत को डंडे मारती है । सरकार के खिलाफ़ किसी भी तरह का अंदोलन किया जाता है । तो पुलिस आकर निर्दोष लोगो को डंडे मारने शुरु कर देती है । आज तक किसी भी राजा ने पुलिस नही बनाई सबकी सेना हुआ करती थी | अंग्रेजो ने पुलिस और indian police act क्रान्तिकारियों को लाठियो से पीटने और अपना बचाव करने के लिय़े बनाया था । और आजादी के 64 साल बाद भी ये पुलिस सरकार में बैठे काले अंग्रेजो की हितो की रक्षा करती है ।और सरकार के खिलाफ़ आन्दोलन करने वालो को वैसे ही पीटती है । जैसे अंग्रेजो कि पुलिस पीटा करती थी ।
और सबसे ताज़ी घटना 4 जून की वो भयानक रात, जब काला धन वापिस लाने के लिये रामलीला मैदान में सोये हुए देश भक्तो पर आधी रात को काले अंग्रेजो के कहने पर लाठिया बरसाई । इसमे सेकड़ो लोग घायल हो गये । और लाला लाजपत राय की तरह बहन राजबाला को लाठिया मार मार कर मार डाला ।
आज हर साल 23 मार्च को हम भगत सिंह का शहीदी दिवस मानाते हैं । लाला लाजपत राय का शहीदी दिवस मानाते हैं । किस मुँह से हम उनको श्रधांजलि
  अर्पित करे । कि लाला लाजपत राय जी, जिस कानून के आधार आपको लाठिया मारी गई, और आपकी हत्या कर दी गयी, उस कानून को हम आजादी के 64 साल बाद भी हम खत्म नहीं करवा पाये । किस मुँह से हम भगत सिंह को श्रधान्जली दे ?  कि भगत सिंह जी जिस अंग्रेजी कानून के आधार पर आपको फ़ासी की सज़ा हुई । आजादी के 64 साल बाद भी हम उसको सिर पर ढो रहे हैं । आज आजादी के 64 साल बाद भी पुलिस आन्दोलन करने वाले भारत वासियो को वैसे ही डंडे मारती हें, जैसे अंग्रेजो की पुलिस मारती तो थी तो कैसे ख सकते हें की हम आजाद हैं|
यह तो थी एक indian police act की कहानी ! अंग्रेज़ो ने ऐसे 34700 कानून भारत को गुलाम बनाने के लिए बनाए थे ! और बहुत शर्म की बात है !वो सारे
के सारे कानून आज भी वैसे के वैसे देश चल रहे हैं !! एक भी कानून को हम बदल नहीं पाये ! बस फर्क इतना है पहले गोरे अंग्रेज़ शासन करते थे, आज काले अंग्रेज़ शासन कर रहे हैं |

बुधवार, 19 सितंबर 2012

ये पोस्ट जरुर पढ़े और शेयर भी करे, आप सब से हाथ जोड़ कर निवेदन हें, सारे दलो के नेता मोदी को हराने के पीछे पड़े, अकेला पड़ता एक विकास पुरुष......

गुजरात में विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा व काग्रेस समेत करीब एक दर्जन राजनीतिक दल मैदान में कूद चुके है। काग्रेस, जीपीपी, राकापा, जदयू, लोजपा, शिवसेना, सपा व बसपा सहित हर दल के निशाने पर गुजरात गोरव मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी है, जबकि मोदी के निशाने पर प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह व काग्रेस महासचिव राहुल गाधी। सारी पार्टिया आज मोदी जी के पीछे हाथ धो कर पड़ गयी हें, क्यों की वो सिर्फ आम जनता के विकास और फायदे के ही काम करते हें, और दुसरे दल सिर्फ लफ्फासी बाते ही करते हें, और घोटालो के बारे में तो आप जानते ही हें | अब ये सारे चोर और घोटालेबाज दल और नेता यही चाहते हें, और यही काम करते आये हें की, जो भी इस देश का या जनता का विकास करता हें या करने की कोशिश भी अगर करता हें तो ये उसे डुबोने में या उसे बहुत भारी अपराधी साबित करने में लग जाते हें| अब सब मोदी जी के पीछे इसलिए ही पड़े हें क्यों की उनके द्वारा कराए गये विकास कार्यो की चर्चा भारत में ही नही पुरे विश्व में हो रही हें |  
मोदी जी देश के विकास की बात कर रहे है, जबकि अन्य दल वोट ''कटवा'' बनकर भाजपा और मोदी जी का चुनावी गणित बिगाड़ने की रणनीति पर चल रहे है। देश के आम चुनाव से पहले गुजरात विधानसभा के चुनाव को सेमीफाइनल के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें मुख्यमंत्री मोदी व काग्रेस नेता राहुल गाधी का आमना सामना तय है। राजनीतिक बयानबाजी के चलते इस चुनाव पर देश की नजरे टिकी है, मोदी अपनी विवेकानंद युवा यात्रा के जरिए जनसंपर्क में जुटे है, जबकि काग्रेस को अपने स्टार प्रचार राहुल का इन्तजार है। मुख्यमंत्री मोदी अपने शासन के चार हजार दिन पूरे करने के साथ ही मंगलवार को राज्य के 14 हजार सरपंचों का महासम्मेलन आयोजित कर एक बड़े वोट बैंक को साधने की तैयारी में है। इससे पहले मोदी ने गाधीनगर में ही महात्मा मंदिर की स्थापना के दौरान भी प्रदेश के सभी सरपंचों को इसमें भागीदार बनाया था। उधर काग्रेस केंद्र सरकार तथा प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की उपलब्धियों को जनता तक पहुचाकर गुजरात की दशा और दिशा बदलने का भरोसा दे रही है। काग्रेस अपने गुजरात प्रजा विकास दर्शन के जरिए अब तक सात चुनावी घोषणाएं कर चुकी है, जिसमें महिलाओं को आवास, युवाओं को रोजगार, ब्याज मुक्त मोबाइक, मुफ्त शिक्षा व स्वास्थ्य के साथ मुफ्त लेपटॉप देने का झूठा वादा किया गया है।अगर गुजरात की जनता इन चोर कांग्रेसियों के झूठे वादों के चक्कर में पड़ी तो वो अपने विकास पुरुष मोदी को खो देगी | और कांग्रेस फिर से गुजरात को बीमारू राज्यों की लाइन में ला कर पटक देगी | मुख्यमंत्री मोदी अब तक अपने विकास कार्यो के साथ काग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाए हुए है, अब उनके मुद्दों में किराना बाजार में विदेशी निवेश, डीजल के दाम में वृद्धि तथा राहत दरों पर मिलने वाले गैस सिलेंडर भी शामिल हो गए है। मोदी केंद्र के इन फैसलों को जनविरोधी बताने के साथ काग्रेस पर देश को बर्बाद करने का भी आरोप लगा रहे है। इसके जवाब में काग्रेस ने अपने चुनाव प्रबंधकों को मैदान में उतारने के संकेत दिए है। देश में सूचना क्राति के जनक सैम पित्रोदा को गुजरात भेजकर इसकी शुरुआत भी कर दी है। पित्रोदा का कहना है कि केंद्र सरकार पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाधी और बोफोर्स तोप घोटाले के पिता के 21वीं सदी के भारत का सपना पूरा करने को कटिबद्ध है। जिसमे पुरे देश को अमेरिका के यहा गिरवी रखना भी शामिल हें |
मेरी गुजरात वासियों से एक ही अपील हे की मोदी जेसा व्यक्ति उन्हें वापस कभी नही मिलेगा | वोटिंग वाले दिन सब अपना काम बंद रख कर अपने परिवार के हर इंसान वो चाहे कहीं भी हो, उसका वोट मोदी जी के पक्ष में डलवाए, जाती-पाती और दलगत निति से ऊपर उठ कर मोदी को वोट करे, और सारे चोर और लुटर डालो को सबक सिखाये ताकि दुबारा वो गुजरात का रुख नही करे|      

''सिटी ऑफ़ लन्दन'' ने गाये गुजरात और मोदी की महिमा के गुण, दोनों को माना दुनिया के लिए रोल-मोडल ....

दुनिया में नरेंद्र मोदी के शासन में गुजरात की आर्थिक तरक्की, सभी के लिए चर्चा का विषय बन गई है। लंदन के औद्योगिक हिस्से ''सिटी ऑफ लंदन'' की ओर से कराए गए अध्ययन में भारत के गुजरात राज्य को ''आश्चर्यजनक'' करार दिया गया है। वित्तीय रूप से विश्वसनीय बताते हुए गुजरात सरकार के बारे में कहा गया है कि सार्वजनिक-निजी भागीदारी [पीपीपी] की मदद से बनने वाली परियोजनाओं को लागू करने में गुजरात की मोदी सरकार का प्रदर्शन बेमिसाल है।
लंदन शहर का हिस्सा ''सिटी ऑफ लंदन'' ब्रिटेन में वित्तिय सेवा उद्योग का केंद्र है। उसकी ओर से भारत पर सेमीनार के दौरान एक समीक्षा रिपोर्ट पेश की गई। इसमें कहा गया कि राज्य में पीपीपी परियोजनाओं के लिए मजबूत ढांचा है। गुजरात इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट एक्ट के रूप में ऐसी परियोजनाओं के अमल के लिए उसके पास व्यापक अधिकार हैं। सिटी ऑफ लंदन का मुंबई में ऑफिस है, जो भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापार और निवेश को लेकर अहम कड़ी के तौर पर काम करता है|
रिपोर्ट के मुताबिक, वित्तीय निवेश के मामले में गुजरात पुरे भारत सबसे मजबूत स्थिति में है। वह भारत में शीर्ष निवेश स्थान के रूप में उभरा है। विश्वसनीय राज्य सरकार के कारण वहां भुगतान का जोखिम नहीं है। पीपीपी परियोजनाओं को देख रहे गुजरात इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बोर्ड के पास अपेक्षाकृत बेहतर तकनीकी और आकलन क्षमता है। बोर्ड के कामकाज का तरीका भी काफी निष्पक्ष और पारदर्शी है। पूरी दुनिया जिस राज्य या जिस मोदी की तारीफ़ कर रही हें क्या हम एक मोका उस इंसान को नही दे सकते ? 65 सालो की आजादी में 50 सालो तक कोंग्रेस के गाँधी ''राजपरिवार'' को सत्ता सोंपते आ रहे हें| क्या एक मोका गेर राजनितिक परिवार से आये मोदी को नही मिलना चाहिए ? जिसने गुजरात को बीमारू राज्य से विकसित राज्य में बदल दिया | देश का विकास चाहिए तो मोदी को लाईये |

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

महिलाए बाजार गयी तो देना होगा जुर्माना, उत्तर प्रदेश धीरे-धीरे तालिबान की गिरफ्त में, तालिबानी फरमान जारी करती पंचायते ......

उत्तर प्रदेश में बागपत जिले के असारा गांव के बाद अब सहारनपुर के घाटमपुर गांव में 36 बिरादरियों की पंचायत में भी तालिबानी फरमान सुनाया गया है। पंचायत ने बाजार में महिलाओं की खरीदारी पर रोक लगा दी है। इसका उल्लंघन करने पर 500 रुपये जुर्माना होगा। अगर खुले में कोई मोबाइल से गाना बजाता सुना गया, तो उस पर 1500 रुपये का जुर्माना लगेगा। पंचायत ने शराब, गुटखा आदि के सेवन को भी प्रतिबंधित किया है।
सोमवार को गंगोह ब्लॉक के मुस्लिम गुर्जर बहुल घाटमपुर गांव के मदरसे में यह पंचायत आयोजित की गई। अध्यक्षता करने वाले सरपंच अयूब ने बताया कि महिलाएं खरीदारी के लिए बाजार में नहीं जाएंगी। महिलाएं घर के बाहर नल पर पानी नहीं भर सकेंगी। पंचायत ने पांच-पांच व्यक्तियों की छह टीमें बनाई हैं, जो गांव में घूमकर निगरानी करेंगी और दोषी से निर्धारित जुर्माना वसूलेंगी। विरोध करने पर दोगुना जुर्माना होगा। इस मामले में जब एसएसपी डीसी मिश्रा का कहना है कि पंचायत का मामला उनके संज्ञान में नहीं है, लेकिन अगर कानून के खिलाफ कुछ हुआ, तो निश्चित रूप से कार्रवाई की जाएगी। सरपंच अयूब का कहना है कि गांव की बिगड़ती छवि को मद्देनजर ये फैसले लिए गए हैं।
जामिया इमाम मदरसा अनवर, देवबंद के सदर मुफ्ती अरशद फारूकी का कहना है कि, ऐसे फैसले कौम के लिए अच्छी बात हैं। लेकिन इन्हें बंदूक की नोक पर लागू न किया जाए। जरूरत पड़े तो लोगों को समझाया जाए। फरमान लोगों के लिए दिक्कत का कारण न बने। उल्लेखनीय है कि इससे पहले जुलाई माह में बागपत के असारा गांव में 36 बिरादरियों की पंचायत में भी ऐसे ही फरमान जारी किए गए थे। इसमें प्रेम विवाह करने वालों को गांव छोड़ने का फरमान भी था। पंचायत करने वालों का पुलिस से संघर्ष भी हुआ था, और बाद में प्रेम विवाह करने वाले एक परिवार के पांच लोगों का कत्ल भी किया गया।

सोमवार, 17 सितंबर 2012

गोवा में,गोवा सरकार उठाएगी गेस पर बढ़ी कीमतों का बोझ, आम जन की राहत के लिए ....

भाजपा शासित राज्य गोवा के मुख्यमंत्री श्री मनोहर पारिकर का ऐलान, साल में 6 गैस सिलेंडर के बाद बाकि 6 सिलेंडरों पर होने वाला अधिक 350 रुपये का खर्चा गोवा सरकार उठाएगी जिससे जनता पर बोझ ना पड़े |
ये वही मनोहर पारिकर जी हैं, जिन्होंने गोवा की सत्ता सँभालते ही पेट्रोल पर से वैट ख़त्म कर दिया था, जिससे पेट्रोल के दाम देश के बाकि राज्यों की तुलना में गोवा में 10 रुपये सस्ता हो गया था l और आज भी वो मुख्यमंत्री के पर्सनल प्लेन से नही, आम लोगो की तरह सामान्य हवाई जहाज में टिकिट खरीदकर आम जन की तरह ही यात्रा करते हें, ताकि आम जन से वसूले गये टेक्स के पेसो की बर्बादी ना हो  | और दूसरी तरफ कांग्रस की सोनिया जी के परिवार की यात्रा का खर्च 1860 करोड़ रूपये हें |
ये उस ही राज्य में होता है जिस राज्य की जनता जाति और धर्म से उठ कर राष्ट्रवादियों को चुनती हैं, गोवा में 25-30 % आबादी इसाई है| फिर भी उन्होंने भाजपा को तो चुना, पर चुना ऐसे  इंसान को जिस से विकास की आशा थी| और उस इंसान, मनोहर जी ने आम जनता की आशा को पूरा भी किया और ये भी साबित किया की सरकार चाहे तो जनता को राहत दे सकती हें| अगर गोवा की जनता भी कांग्रेस के झांसे में आकर धर्म और झूठे सेकुलरवाद के नाम पर कांग्रेस को चुनती, तो आज उन्हें भी इस राहत से वंचित रहना पड़ता । यानी गोवा भी गुजरात की राह पर चल पड़ा हें |गोवा को भी मिल ही गया एक सच्चा राष्ट्रवादी नेता |  अब जरुरत हें देश को | और देश के लिए राष्ट्रवादी नेता सिर्फ एक, नरेन्द्र मोदी | भाजप को चाहिए स्पष्ट बहुमत, तो मोदी को प्रधानमन्त्री पद का उम्मीदवार घोषित करे | और आप भी इस बार जाति,धर्म और  इलाके की राजनीति से ऊपर उठ कर भाजपा को वोट दे | और मोदी को पी. एम. पद के लिए समर्थन दे जय सियाराम जय हिंद  |

ये हे युवराज ब्रिटेन का, प्रिंस हेरी और एक अपना राहुल गाँधी चित्र पढ़े ....

रविवार, 16 सितंबर 2012

सन 2000 के बाद किसी तेल कम्पनी को घाटा नही हुआ देखे बेलेंस शीट ...........

देश में डीजल व पेट्रोलियम पदार्थो के दाम जब भी बढ़ाए जाते हैं, तो इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल के दाम बढ़ने का हवाला दिया जाता हें या फिर तेल कंपनियों के घाटे की दुहाई दी जाती है। 

लेकिन पिछले 6 सालो में कच्चे तेल के दाम 88 डॉलर से 125 डॉलर के आसपास रहे हें, जब इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल के दाम 96 डॉलर प्रति बेरल थे, तो पेट्रोल 42 रूपये लीटर था, उसके बाद से मार्केट में पेट्रोल के दाम 12 बार बढाये हें| और बार घटे का रोना तेल कंपनियों ने रोया हें | बाहरी देश ये सोच कर ही हेरान होते हे की लाखो करोड़ के इतने घोटाले होने के बाद भी भारत की अर्थ वयवस्था केसे खड़ी हे | इसके पीछे सरकार द्वारा वसूला जाने वाला लाखो करोड़ो के टेक्स हें |
सूचना के अधिकार (आरटीआइ) के तहत पता चला है कि पेट्रोलियम कंपनियां हर साल भारी मुनाफा कमा रही हैं। वर्ष 2010-11 में ही उन्होंने 25 हजार करोड़ रुपये से भी अधिक का शुद्ध मुनाफा कमाया। यह जानकारी विकास गहलोत ने आरटीआइ के सहारे हासिल की है। विकास ने हिंदुस्तान पेट्रोलियम, भारत पेट्रोलियम, इंडियन ऑयल, ओएनजीसी, गेल इंडिया, नुमालीगढ़ रिफाइनरी, बामर लॉरी एंड कंपनी से उनकी लाभांश रिपोर्ट मांगी। इस पर कंपनियों ने जो जवाब दिए वो दिमाग की बत्ती गुल करने के साथ ही, चौंकाने वाले भी हैं। इससे पता चला है कि किसी भी तेल कंपनी को साल 2000 के बाद कोई नुकसान ही नहीं हुआ है। फिर भी पेट्रोल, डीजल या गैस की कीमत बढ़ा दी जाती है। यदि प्रमुख कंपनियों के साल 2010-11 के शुद्ध मुनाफे को जोड़ दिया जाए, तो यह करीब 25 हजार करोड़ रुपये के आंकड़े को छू जाता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि तेल के दाम बढ़ाने के पीछे सिर्फ मुनाफा बढ़ाना ही कंपनियों का मुख्य कार्य  है।
कंपनी                                 वित्त वर्ष                      मुनाफा
1. आइओसीएल                 2006-07                       7499 करोड़ 
                                         2007-08                       6963 करोड़ 
                                         2008-09                       2950 करोड़ 
                                         2009-10                       10,221 करोड़ 
                                         2010-11                        7445 करोड़ 


2. बीपीसीएल                     2006-07                        1805 करोड़ 
                                          2007-08                       1580 करोड़ 
                                          2008-09                       735 करोड़ 
                                          2009-10                       1537 करोड़ 
                                          2010-11                       1546 करोड़ 


3. एचपीसीएल                    2009-10                       8715 करोड़ 
                                          2010-11                       9373 करोड़ 

4. ओएनजीसी                    2006-07                        901 करोड़ 
                                          2007-08                       1663 करोड़ 
                                          2008-09                       2806 करोड़ 
                                          2009-10                       2089 करोड़ 
                                          2010-11                       2690 करोड़ 

5. गेल (इंडिया)                   2006-07                       2386 करोड़ 
                                          2007-08                       2601 करोड़ 
                                          2008-09                       2803 करोड़ 
                                          2009-10                       3139 करोड़ 
                                          2010-11                        3561 करोड़ 
(सारा शुद्ध लाभ करोड़ रुपये में )

ईस्ट इंडिया कम्पनी वापस आ रही हे भारत (देश पर सेकड़ो साल राज करने और लुटने वाली) नया नाम वाल-मार्ट....

लगता है ये सरदार अपनी ''ख़ामोशी का मियां मिट्टू'' को यह गलत फहमी हो गई है की वर्तमान में दुनियां में एक ही अर्थ शास्त्री जिन्दा बचा है ( खुद वो ) जो पुरे हिंदुस्तान को बेवकूफ बना सकता है ।
सरदार जी समझा रहें हैं की ...............

एफ डी आई की वजह से ''वितीय घाटा कम होगा "
 सरदार जी समझते हे की देश की जनता तो बेवकूफ है, जो इतना नहीं समझती कि -
जो विदेशी कम्पनी खुदरा बाज़ार( किराना ) में आयेंगी, वो हमारे खुदरा बाज़ार में सेंध लगाएंगी।
मतलब कुल बाजार का बड़ा हिस्सा उनके ( विदेशी वाल मार्ट ) हाथ और छोटा हिस्सा गुलाम हिन्दुस्तानी के हाथ,  पर बाज़ार उतने का उतना ही रहेगा, इसका मतलब वित्तीय व्यपार तो उतना ही रहना है।
क्यों की विदेशी कम्पनी से आटा खरीदने से आप चार की जगह दस रोटी तो नहीं खाओगे।
बल्कि जो वो कमाएंगे उसमे से 30 % वे अपना पैसा देश के बाहर भेजेंगे।
जिसकी वजह से एक मुर्ख अर्थ शास्त्री भी बता देगा की हमारी वित्तीय घटा बढेगा |
सोचो जनता तुम्हें कितना......................" मुर्ख , गधा गवांर और गुलाम समझते हैं ये काले अंग्रेज "

शनिवार, 15 सितंबर 2012

देश में शिव जी के 12 ज्योतिर्लिंग थे,11 तो हें 12 वाँ कहाँ गया ? जाने पूरी हकीकत.........

भारत में 12 ज्योतिर्लिंग थे 11 का सब को पता हें 12 व कहा गया ? आपको पता हें ? चलो में बताता हूँ 12 वे ज्योतिर्लिंग का नाम हे अग्रेश्वर महादेव जो की आगरा में स्थित था|  अब आप कहेंगे की आगरा में आज की तारीख में तो कोई शिव जी का ज्योतिर्लिंग नही हें ? किसी जमाने में, जिसे आज सब ताज महल कहते हें, वो शिवालय हुआ करता था |जिसे शाहजहाँ ने अपनी पत्नी या कहे की बच्चे पैदा करने की मशीन मुमताज की लाश को दफ़न करने के लिए जबरदस्ती छीन लिया था | पूरी तथ्यात्मक रिपोर्ट पढ़े और अगर आप की रगों में हिन्दू का खून हें, तो ज्यादा से ज्यादा शेयर जरुर करे......
>प्रो. ओक कि खोज ताजमहल के नाम से प्रारम्भ होती है———
=”महल” शब्द, अफगानिस्तान से लेकर अल्जीरिया तक किसी भी मुस्लिम देश में भवनों के लिए प्रयोग नही किया जाता…
यहाँ यह व्याख्या करना कि, महल शब्द मुमताज महल से लिया गया है……वह कम से कम दो प्रकार से तर्कहीन है-
पहला - शाहजहाँ कि पत्नी का नाम मुमताज महल कभी नही था, बल्कि उसका नाम मुमताज-उल-ज़मानी था ।
और दूसरा - किसी भवन का नामकरण किसी महिला के नाम के आधार पर रखने के लिए केवल अन्तिम आधे भाग (ताज)का ही प्रयोग किया जाए और प्रथम अर्ध भाग (मुम) को छोड़ दिया जाए, यह समझ से परे है ।
प्रो.ओक दावा करते हैं कि,ताजमहल नाम तेजो महालय (भगवान शिव का महल) का बिगड़ा हुआ संस्करण है, साथ ही साथ ओक कहते हैं कि -
मुमताज और शाहजहाँ कि प्रेम कहानी, चापलूस इतिहासकारों की भयंकर भूल और लापरवाह पुरातत्वविदों की सफ़ाई से, स्वयं गढ़ी गई कोरी अफवाह मात्र है, क्योंकि अगर इसमे थोड़ी भी सच्चाई होती तो शाहजहाँ के समय का कम से कम एक शासकीय अभिलेख इस प्रेम कहानी की पुष्टि कही ना कही जरुर करता है…..
इसके अतिरिक्त बहुत से प्रमाण ओक के कथन का प्रत्यक्षतः समर्थन कर रहे हैं……
तेजो महालय (ताजमहल) मुग़ल बादशाह के युग से पहले बना था, और यह भगवान् शिव को समर्पित था तथा आगरा के राजपूतों द्वारा पूजा जाता था ।
==>न्यूयार्क के पुरातत्वविद प्रो. मर्विन मिलर ने ताज के यमुना की तरफ़ के दरवाजे की लकड़ी की कार्बन डेटिंग के आधार पर 1985 में यह सिद्ध किया कि, यह दरवाजा सन् 1359 के आसपास अर्थात् शाहजहाँ के काल से लगभग 300 वर्ष पुराना है ।
==>मुमताज कि मृत्यु जिस वर्ष (1631) में हुई थी, उसी वर्ष के अंग्रेज भ्रमण कर्ता पीटर मुंडी का लेख भी इसका समर्थन करता है कि, ताजमहल मुग़ल बादशाह के पहले का एक अति महत्वपूर्ण भवन था ।
==>यूरोपियन यात्री जॉन अल्बर्ट मैनडेल्स्लो ने सन् 1638 (मुमताज कि मृत्यु के 07 साल बाद) में आगरा भ्रमण किया, और इस शहर के सम्पूर्ण जीवन वृत्तांत का वर्णन किया, परन्तु उसने ताज के बनने का कोई भी सन्दर्भ नही प्रस्तुत किया, जबकि भ्रांतियों मे यह कहा जाता है कि ताज का निर्माण कार्य 1631 से 1651 तक जोर शोर से चल रहा था ।
==>फ्रांसीसी यात्री फविक्स बर्निअर एम.डी. जो औरंगजेब द्वारा गद्दीनशीन होने के समय भारत आया था, और लगभग दस साल यहाँ रहा, के लिखित विवरण से पता चलता है कि, औरंगजेब के शासन के समय यह झूठ फैलाया जाना शुरू किया गया कि, ताजमहल शाहजहाँ ने बनवाया था…….
प्रो. ओक. बहुत सी आकृतियों और शिल्प सम्बन्धी असंगताओं को इंगित करते हैं जो इस विश्वास का समर्थन करते हैं कि, ताजमहल विशाल मकबरा न होकर विशेषतः हिंदू शिव मन्दिर है…….
आज भी ताजमहल के बहुत से कमरे शाहजहाँ के काल से बंद पड़े हैं, जो आम जनता की पहुँच से परे हैं। प्रो. ओक जोर देकर कहते हैं कि, हिंदू मंदिरों में ही पूजा एवं धार्मिक संस्कारों के लिए भगवान् शिव की मूर्ति, त्रिशूल,कलश और ॐ आदि वस्तुएं प्रयोग की जाती हैं।
==>ताज महल के सम्बन्ध में यह आम किवदंत्ती प्रचलित है कि ताजमहल के अन्दर मुमताज की कब्र पर सदैव बूँद बूँद कर पानी टपकता रहता है, यदि यह सत्य है तो पूरे विश्व मे किसी कि भी कब्र पर बूँद बूँद कर पानी नही टपकाया जाता, जबकि प्रत्येक हिंदू शिव मन्दिर में ही शिवलिंग पर बूँद बूँद कर पानी टपकाने की व्यवस्था की जाती है, फ़िर ताजमहल (मकबरे) में बूँद बूँद कर पानी टपकाने का क्या मतलब….????
राजनीतिक भर्त्सना के डर से इंदिरा गाँधी सरकार ने ओक की सभी पुस्तकें स्टोर्स से वापस ले लीं थीं, और इन पुस्तकों के प्रथम संस्करण को छापने वाले संपादकों को भयंकर परिणाम भुगत लेने की धमकियां भी दी गईं थी ।
प्रो. पी. एन. ओक के अनुसंधान को ग़लत या सिद्ध करने का केवल एक ही रास्ता है, कि वर्तमान केन्द्र सरकार बंद कमरों को संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षण में खुलवाए, और अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों को छानबीन करने दे ।
ज़रा सोचिये….!!!!!!
कि यदि ओक का अनुसंधान पूर्णतयः सत्य है तो किसी देशी राजा के बनवाए गए संगमरमरी आकर्षण वाले खूबसूरत, शानदार एवं विश्व के महान आश्चर्यों में से एक भवन, “तेजो महालय” को बनवाने का श्रेय बाहर से आए मुग़ल बादशाह शाहजहाँ को क्यों……?????
तथा -
इससे जुड़ी तमाम यादों का सम्बन्ध मुमताज-उल-ज़मानी से क्यों……..??????? ताजमहल के बारे में ये लाइने बिलकुल सटीक बैठती हें--
आंसू टपक रहे हैं, हवेली के बाम से,
रूहें लिपट के रोती हैं, हर खासों आम से,
अपनों ने बुना था हमें, कुदरत के काम से,
फ़िर भी यहाँ जिंदा हैं, हम गैरों के नाम से,

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

गुजरात में चुनाव प्रचार से पीछे हटी कांग्रेस, कहा राहुल नही जायेंगे गुजरात प्रचार करने .....

Modi challenges 'scared' Rahul to come and campaign in Gujaratगुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने काग्रेस महासचिव राहुल गांधी को प्रदेश में प्रचार की चुनौती दी है। पर कांग्रेस का कहना हें की राहुल गुजरात में प्रचार कार्यक्रम में हिस्सा नही लेंगे। शायद यु.पी. चुनाव से कुछ सबक मिला हें ।
नरेंद्र मोदी ने कहा कि काग्रेस यह कह रहीहै, कि राहुल गुजरात में प्रचार नहीं करेंगे। क्यों? मैं और गुजरात की जनता इसका कारण जानना चाहती है। क्या राहुल यह सोचते हैं कि गुजरात बहुत बुरा है, इसलिए वह प्रचार नहीं करेंगे? या फिर उन्हें पता हें, की गुजरात में राहुल हो चाहे सोनिया इनकी दाल नही गलेगी, चाहे कितना भी प्रचार कर ले ।
वलसाड के मोटा पोंधा गाव में एक रैली में मोदी ने यह बात कही। मोदी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, काग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाधी पर हमला बोलते हुए कहा कि वह किसी से भी मुकाबले के लिए तैयार हैं। भाजपा नेता स्मृति ईरानी ने भी कहा कि राहुल गाधी गुजरात कैसे आ सकते हैं ? क्योंकि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में काग्रेस की हार के बाद उन्हें हकीकत पता चल गई है ।

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

अब कृषि-मंत्री शरद पवार बेचेंगे देश के बीजो का जीन, दुनिया का सबसे बड़ा कृषि बीज जीन बेंक भारत का, बर्बादी की राह पर भारत ........

भारत का ''बीज'' जीन बैंक दुनिया के सबसे बड़े जीन बैंकों में से एक है. जिसे कांग्रेस के कृषि मंत्री शरद पवार विदेशी कंपनियों को लुटाने की तेयारी कर रहे हें । देश में कुछ भी नही छोड़ेंगे ये सोनिया के पालतू, हर भारतीय माल, चाहे वो कोयला हो चाहे थोरियम हो चाहे भारतीय पुरा- महत्तव की चीजे सब विदेशियों को बेचने में लगे हें, लेकिन आप फ़िक्र मत कीजिये जब फिर से कोई इस्ट-इण्डिया कम्पनी की तरह और कोई कम्पनी देश को गुलाम बना लेगी, तब सोचना आप की अब इनसे आजादी केसे पाई जाये, और इस बार किसी चन्द्र शेखर या भगत सिंह का इन्तजार मत करना इस बार तो वो भी नही आयेंगे,
वेसे
बीजों का महत्व क्या होता है, इसे द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रूस में घटी एक घटना से समझा जा सकता है| रूसी सैनिकों के पास बीजों का एक भंडार था, लेकिन उन्होंने भूखों मरना स्वीकार किया, बजाय उन बीजों को खाकर अपनी जान बचाने के, ऐसा नहीं है कि देश के भीतर अनुसंधान केंद्र नहीं हैं या नए किस्म के बीजों की खोज नहीं हो रही है. जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) बीजों के दौर में सरकार ने करोड़ों रुपये अनुसंधान के लिए खर्च किए, फिर भी देश में किसानों और कृषि की हालत सुधरने के बजाय बिगड़ती क्यों जा रही है?
आखिर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद जैसी संस्थाओं और देश के कृषि मंत्रालय का इस सबमें रोल क्या है? जिन देशी फसलों के जेनेटिकली मॉडिफाइड बीज तैयार करने का दावा किया जाता है, वे कहां हैं?
जब आईसीएआर ने विभिन्न जगहों पर विकसित किए जा रहे जेनेटिकली मॉडिफाइड बीजों के लिए फील्ड डे ऑर्गेनाइज किए थे, तब उस दौरान बीज एवं कृषि से जुड़ी प्राइवेट एंग्रीकल्चर कंपनियों को बुलाया गया था. वहां कोई सुरक्षा नहीं थी. इस दौरान कितना जेनेटिक मैटेरियल ले जाया गया या चोरी किया गया, इस बात की कोई गारंटी नहीं है. 

सवाल है कि इस देश के कृषि मंत्री कृषि मंत्री है, या क्रिकेट मंत्री जो किसानों की खड़ी फसल में क्रिकेट खेलते हैं? आखिर इस संगीन मामले की जांच क्यों नहीं कराई जा रही है?
आईसीएआर ने विदेशी बीज कंपनियों के हाथों देश का उन्नत देशी सीड जीन बैंक भी गिरवी रखने की तैयारी कर ली है. एक रिपोर्ट के मुताबिक़, आईसीएआर ने बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों से हाथ मिलाने का फैसला कर लिया है. इसके पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि इन कंपनियों की विशेषज्ञता का लाभ उठाकर भारत लंबे समय तक चलने और ज़्यादा उपज देने वाले बीजों का विकास कर सकता है|

आईसीएआर के उप महानिदेशक डॉ. एस के दत्ता ने इन कंपनियों से एक्स्पर्टीज (विशेषज्ञता) के बदले अपने सीड जीन बैंक का दरवाज़ा खोलने की बात कही है. एक अनुमान के मुताबिक़, आईसीएआर क़रीब 4 लाख से भी ज़्यादा देशी बीजों के संवर्धित जीन (जर्म प्लाज्म) इन कंपनियों को दे सकती है.
किसी प्रोजेक्ट के मुखिया के चुनाव के लिए क्या मापदंड होने चाहिए? अहम फसलों के बीजों के जीन संवर्धन के लिए केंद्र सरकार के करोड़ों के प्रोजेक्ट के मुखिया डॉ. के सी बंसल ने पहले तो उन बीजों को कहीं जमा ही नहीं कराया, जिनके विकास का वह दावा कर रहे थे. फिर उन्होंने एक प्रतिष्ठित अवॉर्ड (आईसीएआर की ओर से दिया जाने वाला ऱफी अहमद किदवई अवॉर्ड) पाने के लिए जिस प्रजाति के पेटेंट का दावा किया था, उस पर भी कई सवाल खड़े किए जा रहे हैं. 21 जुलाई, 2011 को राष्ट्रीय पादप जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान केंद्र
(एनआरसीपीबी) के परियोजना निदेशक डॉ. पी आनंद कुमार ने आईसीएआर के उप महानिदेशक को लिखे अपने पत्र में बताया है कि, डॉ. के सी बंसल के जिस प्रजाति के बैंगन के पेटेंट का ज़िक्र ऱफी अहमद किदवई अवॉर्ड के साइटेशन में किया गया है, असल में उसके पेटेंट के लिए बंसल ने आधिकरिक रूप से कोई अनुमति ही नहीं ली थी|  ये कांग्रेस के पालतू कृषि मंत्री शरद पवार की साजिश हें , एक और नये घोटाले की रूप रेखा तेयार की जा रही हें । 

बुधवार, 12 सितंबर 2012

मोदी-गाथा की गाथा की झलकिया, तस्वीर विकसित गुजरात की जिसे शायद देश के दुसरे लोग नही देख पाते हे ......

 ये नजारा किसी विदेशी लोकेशन का नही हें, ये हें हमारे नरेन्द्र मोदी के गुजरात का 
साबरमती नदी के उपर खड़े एक पुल का नजारा, ये तो सिर्फ एक हिस्सा है, गुजरात गोरव नरेन्द्र मोदी के सपने ''समान रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट'' का ।
जो साबरमती आज से दस साल पहले अपनी दोनों और की गन्दगी और झोपड़-पट्टी के कारण बदनाम थी और गंदे नाले में तब्दील होने जा रही थी दिल्ली की यमुना नदी की तरह, उसी साबरमती नदी को आज मोदी ने नदियों की रानी जैसा रूप दे दिया सिर्फ दस साल में इसे कहते है विकास। 

दस साल पहले सड़क दुर्घटना में मरने वालो की जो तादाद थी, उस में भारी गिरावट आयी है आज मोदी  की 108 इमर्जन्सी की वजह से, 

आज तक १००००० से भी ज्यादा लोगो की जाने बची है, और दूर दराज के गाँव में वक़्त पर 108 पहुँचने की वजह से 1500000 औरतो की सलामत प्रसूति हुई है,और माँ-शिशु म्रत्यु दर भारी कमी आई हें, इसे कहते है विकास.

कांग्रेसियों की चोर नीतियों के कारण पुरे देश में एग्रीकल्चर ग्रोथ रेट मात्र 3.3% है ,,,वही गुजरात का ग्रोथ रेट 10.8 % है आज,

आज से दस साल पहले गुजरात के किसानो की कुल आय 15000  करोड़ थी वो 700% बढ़कर 96000  जी हां छियानवे हज़ार करोड़ हो चुकी है आज, खेती लायक ज़मीन जो 106 लाख हेक्टर थी, वो भी बढ़ कर 145 लाख हेक्टर हो गयी है।

दिल्ली  के सांसदों के घर में भी आज इनवर्टर या जरनेटर से काम चलाना पड़ता है,,,,और गुजरात के गाँव भी २४ घंटा बिजली से रोशन रहते हें, बिजली बंद होना गुजराती  के लिए आश्चर्य के साथ एडवेन्चर की तरह हें और इतनी सप्लाई के बाद भी सर प्लस बिजली है गुजरात के पास, 
किसी कांग्रेसी दुखियारे राज्य (राजस्थान , महा-राष्ट्र को मदद करने के लिए।

अब आप ही सोच लो की  हिंदुस्तान को भी ऐसा विकसित करना है, या करना है हवाले बंगलादेशी घुस-पेठियो के ताकि मोका मिलते ही आप की माँ बहनों , बीवी बेटियों का 20-30 मुल्ले आराम से बलात्कार करेंगे,देखे -  http://hinduttav.blogspot.in/2012/08/blog-post_11.html
मोदी लाओ देश बचाओ ।

मुझे पता है पता है....इटालियन भक्तो को इनके मंद मोहन के वायदों की तरह मेरे येह आंकड़े झूठे लगेंगे ,,,उनके लिए येह लिंक दे रहा हु, मगर इटालियन चस्मा उतार कर पढ़ना तो मजा आएगा ,

http://www.narendramodi.in/gujarats-agricultural-miracle/ 


मंगलवार, 11 सितंबर 2012

''ब्राह्मणों की कोई मदद ना करे'' उत्तर प्रदेश के मुल्ला-यम पुत्र का अखिलेश का आदेश ........





  

 अब भी नही सुधरे तो बिलकुल ''साफ़'' कर देगा ये, मुल्ला-यम और अखिलेश हिन्दुओ को, आने वाले लोक-सभा  चुनावों में सबक सिखाये इन मुल्लो को, एक ही विकल्प नरेन्द्र मोदी को या उसकी पार्टी को ही वोट करे। ............

दुनिया के महान लोग जिन्होंने मानी भारत की आध्यात्म और दिमागी ताकत ......

 दुनिया के महान लोग जिन्होंने मानी भारत की आध्यात्म और दिमागी ताकत ......

1. अलबर्ट आइन्स्टीन (महान वैज्ञानिक )- हम भारत के बहुत ऋणी हैं, जिसने हमें गिनती सिखाई, जिसके बिना कोई भी सार्थक वैज्ञानिक खोज संभव नहीं हो पाती।
2. रोमां रोलां (फ्रांस) - मानव ने आदिकाल से जो सपने देखने शुरू किये, उनके साकार होने का इस धरती पर कोई स्थान है

, तो वो है भारत।
3. हू शिह (अमेरिका में चीन राजदूत)- सीमा पर एक भी सैनिक न भेजते हुए भारत ने बीस सदियों तक सांस्कृतिक धरातल पर चीन को जीता और उसे प्रभावित भी किया और चीन को दिया एक महान बोद्ध धर्म ।

4. मैक्स मुलर- यदि मुझसे कोई पूछे की किस आकाश के तले मानव मन अपने अनमोल उपहारों समेत पूर्णतया विकसित हुआ है, जहां जीवन की जटिल समस्याओं का गहन विश्लेषण हुआ और समाधान भी प्रस्तुत किया गया, जो उसके भी प्रसंशा का पात्र हुआ जिन्होंने प्लेटो और कांट का अध्ययन किया, तो मैं भारत का नाम लूँगा।
5. मार्क ट्वेन- मनुष्य के इतिहास में जो भी मूल्यवान और सृजनशील सामग्री है, उसका भंडार अकेले भारत में है।
6. आर्थर शोपेन्हावर - विश्व भर में ऐसा कोई अध्ययन नहीं है, जो उपनिषदों जितना उपकारी और उद्दत हो। यही मेरे जीवन को शांति देता रहा है,और वही मृत्यु में भी शांति देगा।
7. हेनरी डेविड थोरो - प्रातः काल मैं अपनी बुद्धिमत्ता को अपूर्व और ब्रह्माण्डव्य रूपी गीता के तत्वज्ञान से स्नान करता हूँ, जिसकी तुलना में हमारा आधुनिक विश्व और उसका साहित्य अत्यंत क्षुद्र और तुच्छ जन पड़ता है।
8. राल्फ वाल्डो इमर्सन - मैं भगवत गीता का अत्यंत ऋणी हूँ। यह पहला ग्रन्थ है जिसे पढ़कर मुझे लगा की किसी विराट शक्ति से हमारा संवाद हो रहा है।
9. विल्हन वोन हम्बोल्ट- गीता एक अत्यंत सुन्दर और संभवतः एकमात्र सच्चा दार्शनिक ग्रन्थ है, जो किसी अन्य भाषा में नहीं। वह एक ऐसी गहन और उन्नत वस्तु है जैस पर सारी दुनिया गर्व कर सकती है।
10. एनी बेसेंट -विश्व के विभिन्न धर्मों का लगभग ४० वर्ष अध्ययन करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंची हूँ की हिंदुत्व जैसा परिपूर्ण, वैज्ञानिक, दार्शनिक और अध्यात्मिक धर्म और कोई नहीं। इसमें कोई भूल न करे की बिना हिंदुत्व के भारत का कोई भविष्य नहीं है। हिंदुत्व ऐसी भूमि है, जिसमे भारत की जड़े गहरे तक पहुंची है, उन्हें यदि उखाड़ा गया तो यह महावृक्ष निश्चय ही अपनी भूमि से उखड जायेगा। हिन्दू ही यदि हिंदुत्व की रक्षा नही करेंगे, तो कौन करेगा? अगर भारत के सपूत हिंदुत्व में विश्वास नहीं करेंगे तो कौन उनकी रक्षा करेगा? भारत ही भारत की रक्षा करेगा। भारत और हिंदुत्व एक ही है।

सोमवार, 10 सितंबर 2012

जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी दिल्ली में गो-मांस पार्टी की तेयारी .....

देश के प्रतिष्ठित संस्थान जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय [जेएनयू] में एक संगठन गोमांस पार्टी की तैयारी कर रहा है। इस संगठन को एक वामपंथी संगठन बढ़ावा दे रहा है। माहौल बिगड़ने की आशंका को देखते हुए पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गई हैं। विश्व हिंदू परिषद व अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने पार्टी आयोजित करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी है। हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में भी इस तरह की एक पार्टी हुई थी। विरोध में एक छात्र को चाकू मार दिया गया। इसके बाद भड़की हिंसा में पांच छात्र बुरी तरह घायल हुए थे और कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया।
जेएनयू में 'द न्यू मटेरियलिस्ट' नामक एक संगठन गुपचुप तरीके से गोमांस पार्टी की तैयारी कर रहा है। छात्रसंघ चुनाव के दौरान उसने माहौल को गर्म करने के लिए शनिवार रात कई छात्र संगठनों की बैठक कर पार्टी आयोजन के लिए समिति का गठन किया है। पहले यह पार्टी 17 सितंबर को ईवीआर पेरियार के जन्म दिवस पर होनी थी, मगर अब यह छात्रसंघ चुनाव के चलते 28 सितंबर को शहीद भगत सिंह के जन्म दिवस पर होगी। इसे लेकर कैंपस में पर्चे बांटे जा रहे हैं, जिसमें जन्माष्टमी को रसिया का जन्मदिन और होली पर भांग पीने का हवाला देते हुए गोमांस पार्टी आयोजित कर खाने की स्वतंत्रता की मांग की गई है। वामपंथी छात्र संगठनों ने यह तय किया है कि गोमांस को सार्वजनिक तौर पर ना पका कर अपनी-अपनी रसोइयों में पकाएंगे। इसके बाद पार्टी में उसका सेवन किया जाएगा। दक्षिणी जिला की पुलिस उपायुक्त छाया शर्मा का कहना है कि पुलिस पूरे मामले पर नजर रखे हुए है।
कावेरी छात्रावास में हुई बैठक पर जेएनयू सेंटर फॉर अफ्रीकन स्टडीज में पीएचडी कर रहे अनूप कहते हैं कि गोमांस कहां से आएगा और कैंपस में पार्टी कहां होगी, इसका निर्णय कमेटी के सदस्य मिलकर करेंगे। हमारा उद्देश्य भाजपा, आरएसएस सहित हिंदूवादी संगठनों की राजनीति पर प्रहार करना है। ऐसे संगठनों ने गाय को राजनीति का केंद्र बनाया हुआ है। अनूप का कहना है कि जेएनयू संसद के कानून द्वारा बना शैक्षणिक संस्थान है। इसलिए गोमांस पार्टी पर दिल्ली एनसीआर एक्ट-1994 को वह नहीं मानते। गोमांस पार्टी आयोजन को लेकर अभी तक हुई बैठकों में जेएनयू व डीयू के कई प्राध्यापक भी शिरकत कर चुके हैं।
जेएनयू के कुलपति प्रो. एसके सोपोरी ने कहा है कि छात्रों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। लेकिन ऐसा आयोजन किसी भी कीमत पर नहीं होने दिया जाएगा। दिल्ली में गोमांस प्रतिबंधित है। ऐसा करने पर छात्रों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
वहीं विश्व हिंदू परिषद दिल्ली के महामंत्री सत्येंद्र मोहन ने इस मुद्दे पर पार्टी मनाने वालों को सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए कहा है कि गोमांस पार्टी करने वाले को देश में नहीं रहने दिया जाएगा। गौ माता का मांस खाने वाले इस आयोजन से पहले अपने मांस की चिंता कर लें। अगर ऐसा हुआ तो उसके गंभीर नतीजे होंगे।
वहीं, जेएनयू छात्रा और एबीवीपी की प्रदेश उपाध्यक्ष गायत्री दीक्षित ने इस मसले पर अपना विरोध दर्ज कराते हुए कहा कि मैने कुलपति को शिकायत कर अपना विरोध जताया है। अगर जेएनयू में ऐसा हुआ तो यहां की शांति भंग हो जाएगी।

आगे से जब आप वन्दे मातरम् गाये, तो इसकी हकीकत जान ले, की जवाहर नेहरु की मुस्लिम तुष्टिकरण का केसे शिकार हुआ...

वन्दे मातरम गीत में ६ पद हैं, लेकिन इनमे से सिर्फ २ ही पदों को राष्ट्र गीत का स्थान प्राप्त है, इसके ४ पदों को राष्ट्र गीत का स्थान इसलिए नहीं मिला, क्यों की उसमे माँ दुर्गा की आराधना दिखी, देश में सभी सांसदों 1947  में उस वक़्त पुरे गीत को रखने के समथन में वोट दिया था, लेकिन नेहरु ने आजादी के समय ये नीचता सिर्फ मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते की थी, क्यों की वो खुद भी तो मुल्ला ही थे देखे, http://oneindian009.blogspot.in/2012/05/blog-post_16.html
मेरा आप लोगो से निवेदन है कि जब भी आप वन्दे मातरम गाये तो पूरा गाये न कि सिर्फ २ पद....

वन्दे मातरम्।
सुजलां सुफलां मलय़जशीतलाम्,
शस्यश्यामलां मातरम्। वन्दे मातरम् ।।१।।
शुभ्रज्योत्स्ना पुलकितयामिनीम्,
फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीं सुमधुरभाषिणीम्,
सुखदां वरदां मातरम् । वन्दे मातरम् ।।२।।
कोटि-कोटि कण्ठ कल-कल निनाद कराले,
कोटि-कोटि भुजैर्धृत खरकरवाले,
के बॉले माँ तुमि अबले,
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीम्,
रिपुदलवारिणीं मातरम्। वन्दे मातरम् ।।३।।
तुमि विद्या तुमि धर्म,
तुमि हृदि तुमि मर्म,
त्वं हि प्राणाः शरीरे,
बाहुते तुमि माँ शक्ति,
हृदय़े तुमि माँ भक्ति,
तोमारेई प्रतिमा गड़ि मन्दिरे-मन्दिरे। वन्दे मातरम् ।।४।।
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,
कमला कमलदलविहारिणी,
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्,
नमामि कमलां अमलां अतुलाम्,
सुजलां सुफलां मातरम्। वन्दे मातरम् ।।५।।
श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्,
धरणीं भरणीं मातरम्। वन्दे मातरम् ।।६।।
जय हिंद .... वन्दे मातरम .... अब कांग्रेस को देश से निकाल कर ही लेंगे दम .......

शनिवार, 8 सितंबर 2012

महिला सिपाही की पिटाई के मामले में टाइटलर पर केस, पूर्व में 1984 सिक्ख दंगो के आरोपी .......

women police beaten by crowd,37 arrestedकाग्रेसी कार्यकर्ताओं द्वारा ओडिशा विधानसभा घेराव के दौरान हुए उपद्रव में महिला कास्टेबल की बेरहमी से पिटाई व बदसलूकी पर कांग्रेस पार्टी ने माफी मागी है। पार्टी ने माफ़ी भी तब मांगी जब राज्य के काग्रेस प्रभारी जगदीश टाइटलर पर कार्यकर्ताओं को उकसाने का आरोप लगा।
(जगदीश  टाइटलर वेसे इस काम में माहिर हें, 1984 के सिख दंगो में भी इन पर सिक्खों को मारने के लिए लोगो को भड़काने के आरोप लगे थे, और खुद कई सिक्खों की हत्याए भी की थी इन्होने, उस मामले से अभी कुछ महीने पहले ही सोनिया गाँधी की क्रपा से  बरी हुए हें,) इस बीच, टाइटलर के खिलाफ केस दर्ज कर लिया गया है। उपद्रव में संलिप्त 34 लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। महिला कास्टेबल की पिटाई व बदसलूकी की जाच राज्य महिला आयोग ने शुरू कर दी है। ओडिशा पुलिस संघ ने पुलिसकर्मियों की पिटाई करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माग की है।
शुक्रवार को अस्पताल में भर्ती महिला कास्टेबल ने बताया कि उस पर 30-40 लोगों ने हमला किया था। दंगाई जगदीश टाइटलर विधानसभा के पास पुलिस द्वारा लगाए गए बैरिकेडिंग को तोड़ने के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं को भड़का रहे थे। इसका बचाव करते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रसाद हरिचंदन ने कहा कि टाइटलर ने हिंसा नहीं भड़काई। साथ ही, महिला कास्टेबल के साथ हुए बदसलूकी पर पार्टी की तरफ से माफी मागी।
पुलिस ने बताया उपद्रव में शामिल 34 लोगों को शुक्रवार को गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी सीसीटीवी से मिले फुटेज के आधार पर की गई। अन्य उपद्रवियों की तलाश की जा रही है। ओडिशा पुलिस संघ के अध्यक्ष सवरमाल शर्मा ने घटना की भ‌र्त्सना करते हुए सरकार को चेतावनी दी। कहा मामले की न्यायिक जाच व दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो। ऐसा न होने पर संघ विरोध-प्रदर्शन करेगा। आरोप लगाया कि प्रदर्शन के नाम पर आपराधिक कृत्य किया गया। अस्पताल में भर्ती महिला कास्टेबल से शुक्रवार को राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष ज्योति पाणिग्रही ने मुलाकात की। बताया कि मामले में आयोग ने जाच शुरू कर दी है। इससे पूर्व शुक्रवार को विधानसभा में काग्रेसियों ने जमकर हंगामा किया। सदन को चलने नहीं दिया।

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस उग्रवादी थे................

ये मैं नहीं कह रहा हु भाई, और ना कोई भारत का दुश्मन देश कह रहा हें, बल्कि ये तो अपने छतीसगढ़ राज्य की पाठ्य पुस्तक निगम की ९ वी क्लास की पुस्तक में छपा हें, इसमे देश के महान स्वतंत्रता सेनानी नेता जी सुभाष चन्द्र बोस को उग्रवादी कह कर संबोधित किया गया है | इस विषय में सरकार को आबगत करवा दिया गया हें, पर अभी तक कुछ भी कारवाही नहीं हुयी है इस विषय में। जो छत्तीसगढ़  से हें वो इस विषय में ज़रूर अपनी बात सरकार तक पहुंचाए या आधिकारियो को बताये ||

 

शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

देश में कोन थे सर्वश्रेष्ट राष्ट्रवादी, मुग़ल शासक या भारतीय शासक .........

कुछ चाटुकार सेकुलरवादियों तथा वामपंथी इतिहासकारों ने मुगल शासनकाल में भारतीय राष्ट्रीयता की विवेचना तथा स्वरूप को तथ्यरहित तथा मनमाने ढंग से प्रस्तुत किया है। इन्होंने मुगल शासनकाल को भारत का 'शानदर युग' तथा मुगल शासकों को 'महान' बताया है।Shah Jahan
भारत के मुगल शासकों में पहले छह शासक (1526-1707) ही प्रमुख थे। शेष ग्यारह शासक तो 1857 तक जैसे-तैसे शासन चलाते रहे। अंतिम शासक (बहादुरशाह जफर) के आते-आते तक मुगल साम्राज्य दिल्ली के लाल किले की चार दीवारी के भीतर तक ही सिमट कर रह गया था।
लेकिन वामपंथी लेखकों ने मनमाने ढंग से राष्ट्रीयता के दो भाग कर दिए। एक को विशुद्ध राष्ट्रवादी तथा दूसरे को सीमित अर्थ में राष्ट्रवादी कहा। इन्होंने मुगल शासक अकबर, औरंगजेब आदि खलनायकों को पहली श्रेणी में तथा महाराणा प्रताप, शिवाजी जैसे नायकों को दूसरी श्रेणी में रखा। यह विडम्बना ही है कि आक्रमणकारी तथा देश के रक्षकों की श्रेणी मनमाने ढंग से, बिना किसी तथ्य या तर्क से निर्धारित की गई। इन सभी कथित विद्वानों ने अपना विश्लेषण करते हुए इसकी कारण-मीमांसा तक नहीं की।
भ्रम फैलाने के कारण

एक प्रसिद्ध इतिहासकार ने वामपंथी लेखकों द्वारा 1860 के दशक में फैलाए गए इस भ्रमजाल के चार सम्भावित कारण दिये हैं। पहला-यह संभावना हो सकती है कि अंग्रेजों ने मुगलों से राज्य छीना था। अत: इन लेखकों ने मुगल शासकों को देशभक्त समझा हो। परन्तु यह कुतर्क ही होगा, क्योंकि ब्रिटिश इतिहासकारों तथा प्रशासकों ने माना है कि अंग्रेजों ने भारतीय सत्ता मुगलों से नहीं बल्कि मराठों तथा सिखों से छीनी थी। अंतिम मुगल शासक बहादुरशाह जफर तो नाममात्र का शासक था, जो दिल्ली के लाल किले तक सीमित था। दूसरा- यह तर्क हो सकता है कि, मुगल शासकों का शासन दिल्ली के पठान शासकों की तुलना में अच्छा था। परन्तु यह कथन भी आधारहीन है। इस आधार पर कोई भी कह सकता है कि ब्रिटिश शासन मुगलों से बेहतर था। तीसरा- अकबर ने अपने शासनकाल में कुछ सुधार किए थे। परन्तु केवल इस कारण ही उसके राज्य को 'राष्ट्रीय राज्य' या उसे 'राष्ट्रीय शासक' नहीं कहा जा सकता। चौथा-कुछ आधुनिक मुस्लिम इतिहासकारों के एक वर्ग ने सत्य को छिपाते हुए मुगल साम्राज्य की सफलताओं को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया, परन्तु साथ ही उन्होंने मुगल शासकों की असफलताओं तथा कमियों को बिल्कुल भुला दिया या छिपाया। अत: वामपंथी इतिहासकारों के कथन राजनीति से प्रेरित तथा अवसरवादिता का परिणाम ही लगते हैं।
अराष्ट्रीय मुगल शासक
मुगल शासक मूलत: विदेशी थे। अत्यधिक शराबी तथा व्यसनी बाबर, मुगलों का प्रथम शासक-वस्तुत: एक लुटेरा था। वह हिन्दुओं के लिए हमेशा 'काफिर' शब्द का प्रयोग करता था (देखे बाबरनामा)। न उसे कभी भारत से लगाव था और न ही यहां के लोगों से। उसे तो भारत के मुसलमान भी नहीं चाहते थे। उससे तो अत्यन्त श्रेष्ठ हसन खां मेवाती था, जिसने स्वेदश की रक्षा के लिए राणा सांगा की सेना में भाग लिया था। मेवाती को अपने पक्ष में लाने के लिए बाबर ने अनेक प्रलोभन दिए थे, लेकिन हसन खां मेवाती ने अपने पुत्र नाहर खां को बाबर द्वारा बन्धक बना लिए जाने के बाद भी स्वदेश भक्ति नहीं छोड़ी। इसी भांति बाबर के अफीमची पुत्र हुमांयू को भारत से किंचित मात्र भी लगाव नहीं था। वह छोटी- मोटी विजय के पश्चात जश्न, दावतों तथा विलासिता में डूब जाता था। बार-बार ईरान की ओर भागता था। वह जीवन भर लुढ़कता रहा और उसकी मृत्यु भी लुढ़क कर हुई थी।
मुगलों का तीसरा साम्राज्यवादी शासन अकबर था, जिसने लगभग 50 वर्षों तक भारत पर शासन किया। स्मिथ के अनुसार उसमें राष्ट्रीयता की एक बूंद तक नहीं थी। वह अफीम मिली शराब का व्यसनी था, तथा उसके नशे में धुत रहता था (स्मिथ-अकबर दि ग्रेट, पृ. 16)। अबुल फजल के अनुसार उसके हरम में 3000 महिलाएं थीं। साम्राज्य के विस्तार में वह तैमूर लंग की भांति नृशंस, क्रूर तथा छल-कपट में जरा भी नहीं हिचकता था। विशेषकर हेमचन्द्र विक्रमादित्य, महारानी दुर्गावती तथा महाराणा प्रताप के साथ संघर्ष उसके कलंकित चरित्र को सामने लाते हैं। अकबर की इस साम्राज्यवादी प्रवृत्ति की विश्व प्रसिद्ध वामपंथी इतिहासकार डा. रामविलास शर्मा ने भी कटु आलोचना की है (देखें-इतिहास दर्शन)। यह भी सत्य है कि उसकी मध्य एशिया में समरकन्द तथा अपने पूर्वजों की भूमि फरगना जीतने की आकांक्षा अधूरी रही। वह 1595 में केवल कांधार ही जीत सका।
राष्ट्रीयता के प्रतीक कौन?
विचारणीय व गंभीर प्रश्न यह है कि भारतीय राष्ट्रीयता का प्रतीक साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षी अकबर है या देशाभिमान पर शहीद होने वाली रानी दुर्गावती, अथवा भारतीय स्वतंत्रता के लिए मर मिटने वाले हेमचन्द्र विक्रमादित्य या देश की आजादी के लिए जंगलों में भटकने वाले महाराणा प्रताप। 
क्या भारत का राष्ट्रीय पुरुष अकबर है जो छल-कपट तथा दूसरों पर आक्रमण कर उसे जीत लेने के पागलपन से युक्त था, या हेमू जैसा साहसी व्यक्ति, जिसने विदेशी शासन को देश से उखाड़ फेंकने तथा दिल्ली पर स्वदेशी शासन पुन: स्थापित करने का प्रयत्न किया? क्या राष्ट्र का प्रतिनिधि गोंडवाना की रानी पर अकारण आक्रमण करने वाला अकबर है। या शत्रु द्वारा पकड़े जाने व अपमानित होने की आशंका के स्वयं छुरा घोंप कर बलिदान देने वाली रानी? क्या राष्ट्र का प्रेरक चित्तौड़ में 30,000 हिन्दुओं का नरसंहार करने वाला अकबर है, या महाराणा प्रताप का संघर्षमय जीवन, जिन्होंने मुगलों की अजेय सेनाओं को नष्ट कर दिया था।
वस्तुत: विद्वानों द्वारा किसी भी शासक का मूल्यांकन राष्ट्र के जीवन मूल्यों के लिए किए गए उसके प्रयत्नों के रूप में आंका जाना चाहिए। इस दृष्टि से भारत के इतिहास में महाराणा प्रताप का नाम सदैव प्रेरक रहा है, अकबर का नहीं। शचीन्द्रनाथ सान्याल की क्रांतिकारी समिति का कोई भी सदस्य ऐसा नहीं हो सकता था, जो चित्तौड़ के विजय स्तम्भ के नीचे शपथ न ले। तब चित्तौड़ की तीर्थयात्रा तथा हल्दी घाटी का तिलक लगाना अनिवार्य हो गया था। वस्तुत: अंग्रेजों की दासता से मुक्ति दिलाने में महाराणा प्रताप के  नाम ने जादू का काम किया था। मजहबी तथा सांस्कृतिक कुकुत्यों में अकबर भी किसी से कम नहीं था। मूर्छित अवस्था में पड़े हेमचन्द्र विक्रमादित्य का सिर काटकर अल्पायु में भारत में पहली बार 'गाजी' की उपाधि प्राप्त करने वाला अकबर बड़ी धनराशि हज जाने वाले यात्रियों पर लुटाता था। पहले इबादत खाना, फिर मजहर, इसके बाद दीन-ए- इलाही उसके मजहबी प्रयत्न थे। मजहर को उसकी गुप्त भावनाओं से प्रेरित एक पाखण्ड नीति कहा गया है। स्मिथ ने उसकी दीन-ए-इलाही की स्थापना की योजना को मिथ्यास्पद तथा निरकुंश स्वेच्छाचारिता का विकास माना है। (देखें, स्मिथ-अकबर दि ग्रेट, पृ. 160)। यह उल्लेखनीय है कि चाटुकार तथा वामपंथी इतिहासकारों के साथ ब्रिटिश इतिहासकारों ने भी अकबर के शासन की बड़ी प्रशंसा की है। यहां तक कि भारत में अंग्रेजों का अंतिम वायसराय लार्ड माउन्टबेटन भी पाकिस्तान के जन्म पर भाषण देने में अकबर को श्रद्धाञ्जलि देना नहीं भूला (देखें, इंडियन एक्सप्रेस, 14 अगस्त, 1947)।
निरंकुश और बर्बर मुगल
जहांगीर तथा शाहजहां-दोनों ही अत्यधिक मतान्ध तथा विलासी थे। दोनों सुरा के साथ सुन्दरी के भी भूखे थे। अकबर के बिगड़ैल पुत्र जहांगीर ने स्वयं लिखा कि वह प्रतिदिन बीस प्याले शराब पीता था। दोनों ने हिन्दू, जैन तथा सिख गुरुओं को बहुत कष्ट दिए थे। ये दोनों अपने पूर्वजों की भूमि नहीं भूले थे। जहांगीर ने इसी कोशिश में कांधार भी गंवा दिया था। शाहजहां ने मध्य एशिया को जीतने में 12 करोड़ रुपए तथा अपार जनशक्ति लगा दी थी, पर एक इंच भूमि तक नहीं जीत सका। शाहजहां की ही मजहबी कट्टरता तथा असहिष्णुता ने औरंगजेब की प्रतिक्रियावादी शासन पद्धति को जन्म दिया था। उसने भारत को दारुल हरब से दरुल इस्लाम बनाने के सभी घिनौने प्रयत्न किए। उसके ही शासन काल में गुरु तेग बहादुर का बलिदान हुआ, गुरु गोविन्द के चारों पुत्रों का बलिदान हुआ था। इसके बावजूद कुछ चाटुकार तथा वामपंथी इतिहासकारों ने उसे 'जिंदा पीर' का भी खिताब दिया है।
यहां पुन: वही प्रश्न है कि औरंगजेब भारत का राष्ट्रीय शासक था, अथवा शिवाजी तथा गुरु गोविन्द सिंह राष्ट्रीय महापुरुष थे? महादेव गोविन्द रानाडे ने शिवाजी के जन्म को एक महान संघर्ष तथा तपस्या का परिणाम माना है। वामपंथी इतिहासकार औरंगजेब की तुलना में शिवाजी को राष्ट्रीय मानने को तैयार नहीं हैं। उनके संघर्ष को देश के साथ जोड़ने में उन्हें लज्जा आती है। जबकि सर यदुनाथ सरकार जैसे विश्वविख्यात इतिहासकार का कथन है कि शिवाजी जैसा सच्चा नेता सम्पूर्ण मानव जाति के लिए एक अद्वितीय देन है। यह सर्वविदित है कि शिवाजी द्वारा हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना का लक्ष्य औरंगजेब जैसे 'जार' से भिन्न था तथा राष्ट्रभक्तों का संरक्षण था। शिवाजी का लक्ष्य हिन्दू साम्राज्य की स्थापना, हिन्दुत्व की रक्षा तथा भारतभूमि से विदेशी साम्राज्य को नष्ट करना था। हर समय घोड़े की पीठ पर रहने वाले शिवाजी की तुलना पालकी में बैठकर युद्ध करने वाले औरंगजेब से किसी भी प्रकार से न्यायोचित नहीं है।
महान तो ये हैं।
इसी भांति गुरु गोविन्द सिंह जी का व्यक्तित्व तथा कृतित्व भारतीय इतिहास का एक स्वर्णिम पृष्ठ है। गुरु गोेविन्द सिंह ने समस्त समाज को, बिना किसी भेदभाव के भयमुक्त तथा नि:स्वार्थ भावना से ओत-प्रोत किया। औरंगजेब को भेजा जफरनामा (विजय पत्र) उनकी वीरता तथा श्रेष्ठता का प्रतीक है। उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना कर सम्पूर्ण राष्ट्र को जीवनदायिनी बूटी दी थी। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि मुगल शासक विदेशी, साम्राज्यवादी, क्रूर, लुटेरे तथा मतान्ध थे। उन्हें न भारत भूमि से कोई लगाव था और न ही भारतीयों से। अभारतीयों को राष्ट्रीय शासक कहना सर्वथा अनुचित है तथा देशघातक है। इसके विपरीत राणा प्रताप, शिवाजी, गुरु गोविन्द सिंह, राणा सांगा, हेमचन्द्र विक्रमादित्य, रानी दुर्गवती विदेशी शासकों को खदेड़ने वाले भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अमर सेनानी थे, जिन्होंने भारत में सांस्कृतिक जीवन मूल्यों की पुन:स्थापना के लिए अपने जीवन का सर्वस्व बलिदान दिया।

बुधवार, 5 सितंबर 2012

नरेन्द्र मोदी को समर्थन करने वाले कोंग्रेसी सांसद को, मोदी को शेर कहना भारी पड़ा खुद कांग्रेस ने लपेटा कोल-मामले में.....

फेसला आपको करना हें की कांग्रेस द्वारा चुतिया बनना हें या, इस बार के चुनावों में इस लुटेरी कांग्रेस को चुतिया बनाना हें,

नरेन्द्र मोदी को ले कर कितना जहर भरा है, कोंग्रेस में इस मामले में साफ़ दिख रहा हें, कई घोटालो में जब भी खुद के मंत्री सांसदों के नाम आये पर उन असली गुनहगारो को उन मामलों में आज तक गिरफ्तार नही किया, और मोदी को शेर कहने वाले सांसद विजय दर्डा को इस मामले में लपेट दिया ताकि एक तीर से दो शिकार हो जाए, की विजय दर्डा की अक्ल भी ठिकाने आ जाए और जनता भी बेवकूफ बन जाए की देखो खुद का सांसद दोषी था तो भी नही बख्शा, और कारवाही की  ??
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आज कोयला घोटाला में पहली FRI दर्ज हुई, ये एक इत्तफाक मात्र नही हो सकता है, कि FIR भी उसी कोंग्रेस सांसद पर हुई। जिसने अभी कुछ दिन पहले ही अहमदाबाद के एक धार्मिक 
समारोह में बाबा रामदेवजी और नरेन्द्र मोदी जी के साथ एक मंच शेयर किया था, और कोंग्रेसी सांसद विजय दरडा ने नरेन्द्र मोदी जी को राजनीती का शेर कहा था, और तभी मोदी जी ने चुटकि भी ली थी, कि दरडा जी पर उनकी (मोदी) की तारीफ़ करने और उन्हें शेर कहने पर कोंग्रेस कोई भी कार्यवाही कर सकती है, और परिणाम आप लोगों के सामने है, अब सवाल ये पैदा होता है कोंग्रेस के अन्दर मोदीजी को लेकर कितना जहर भरा है अपने ही सांसद को सूली पर चढ़ा दिया, क्या कोयला घोटाले में पूरी कोंग्रेस में मात्र दरडा ही दोषी हैं? जब खुद प्रधानमंत्री के हाथ में कोयला मंत्रालय था, मनमोहन के खिलाफ कारवाही क्यों नही ? या उनका सबसे बड़ा गुनाह कोंग्रेस कि नज़र में नरेन्द्र मोदी को शेर कहना है?? फेसला आप खुद कर लीजिये की देश में सच बोलने पर किसी मामले फंसना हें या झूठ बोलकर कांग्रेस की माता सोनिया के तलुवे चाटना हें ......