वेसे
बीजों का महत्व क्या होता है, इसे द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रूस में घटी एक घटना से समझा जा सकता है| रूसी सैनिकों के पास बीजों का एक भंडार था, लेकिन उन्होंने भूखों मरना स्वीकार किया, बजाय उन बीजों को खाकर अपनी जान बचाने के, ऐसा नहीं है कि देश के भीतर अनुसंधान केंद्र नहीं हैं या नए किस्म के बीजों की खोज नहीं हो रही है. जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) बीजों के दौर में सरकार ने करोड़ों रुपये अनुसंधान के लिए खर्च किए, फिर भी देश में किसानों और कृषि की हालत सुधरने के बजाय बिगड़ती क्यों जा रही है?
आखिर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद जैसी संस्थाओं और देश के कृषि मंत्रालय का इस सबमें रोल क्या है? जिन देशी फसलों के जेनेटिकली मॉडिफाइड बीज तैयार करने का दावा किया जाता है, वे कहां हैं?
जब आईसीएआर ने विभिन्न जगहों पर विकसित किए जा रहे जेनेटिकली मॉडिफाइड बीजों के लिए फील्ड डे ऑर्गेनाइज किए थे, तब उस दौरान बीज एवं कृषि से जुड़ी प्राइवेट एंग्रीकल्चर कंपनियों को बुलाया गया था. वहां कोई सुरक्षा नहीं थी. इस दौरान कितना जेनेटिक मैटेरियल ले जाया गया या चोरी किया गया, इस बात की कोई गारंटी नहीं है.
सवाल है कि इस देश के कृषि मंत्री कृषि मंत्री है, या क्रिकेट मंत्री जो किसानों की खड़ी फसल में क्रिकेट खेलते हैं? आखिर इस संगीन मामले की जांच क्यों नहीं कराई जा रही है?
आईसीएआर ने विदेशी बीज कंपनियों के हाथों देश का उन्नत देशी सीड जीन बैंक भी गिरवी रखने की तैयारी कर ली है. एक रिपोर्ट के मुताबिक़, आईसीएआर ने बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों से हाथ मिलाने का फैसला कर लिया है. इसके पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि इन कंपनियों की विशेषज्ञता का लाभ उठाकर भारत लंबे समय तक चलने और ज़्यादा उपज देने वाले बीजों का विकास कर सकता है|
आईसीएआर के उप महानिदेशक डॉ. एस के दत्ता ने इन कंपनियों से एक्स्पर्टीज (विशेषज्ञता) के बदले अपने सीड जीन बैंक का दरवाज़ा खोलने की बात कही है. एक अनुमान के मुताबिक़, आईसीएआर क़रीब 4 लाख से भी ज़्यादा देशी बीजों के संवर्धित जीन (जर्म प्लाज्म) इन कंपनियों को दे सकती है.
किसी प्रोजेक्ट के मुखिया के चुनाव के लिए क्या मापदंड होने चाहिए? अहम फसलों के बीजों के जीन संवर्धन के लिए केंद्र सरकार के करोड़ों के प्रोजेक्ट के मुखिया डॉ. के सी बंसल ने पहले तो उन बीजों को कहीं जमा ही नहीं कराया, जिनके विकास का वह दावा कर रहे थे. फिर उन्होंने एक प्रतिष्ठित अवॉर्ड (आईसीएआर की ओर से दिया जाने वाला ऱफी अहमद किदवई अवॉर्ड) पाने के लिए जिस प्रजाति के पेटेंट का दावा किया था, उस पर भी कई सवाल खड़े किए जा रहे हैं. 21 जुलाई, 2011 को राष्ट्रीय पादप जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान केंद्र (एनआरसीपीबी) के परियोजना निदेशक डॉ. पी आनंद कुमार ने आईसीएआर के उप महानिदेशक को लिखे अपने पत्र में बताया है कि, डॉ. के सी बंसल के जिस प्रजाति के बैंगन के पेटेंट का ज़िक्र ऱफी अहमद किदवई अवॉर्ड के साइटेशन में किया गया है, असल में उसके पेटेंट के लिए बंसल ने आधिकरिक रूप से कोई अनुमति ही नहीं ली थी| ये कांग्रेस के पालतू कृषि मंत्री शरद पवार की साजिश हें , एक और नये घोटाले की रूप रेखा तेयार की जा रही हें ।
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